मुझे कुछ नहीं चाहिए
जो भी जो करेगा
वो वैसे ही अपनों कर्मो से मारा जाएगा
मुझे इस नर्क में नहीं पड़ना
मुझे किसी से नहीं लड़ना
नहीं नहीं नहीं
प्रभु
मुझे कुछ नहीं चाहिए
केवल तुम चाहिए
मुझे कुछ नहीं चाहिए
मुझे प्रेम चाहिए, शांति चाहिए अपने चाहिए
और न मिले तो भी युद्ध का नर्क नहीं चाहिए
क्यों भगवनक्यों कहते हो
तुम क्यों कहते हो
उठो अर्जुन
क्यों मेरे भगवन
मैं अर्जुन नहीं
मैं असहाय
मैं निर्धन
मैं सीधा
मैं सरल
मैं सबका सताया हुआ
अपनों के दुःख का मारा हुआ
दूसरों का दुःख देख नहीं सकता
अपना दुःख सम्हाल नहीं सकता
षडयंत्रो और चालों का मारा हुआ
स्वार्थ और निष्ठुर की सीमा से आश्चर्य चकित
तुमने कहा मैं असहाय नहीं तुम मेरे
मैंने सदा माना
तुमने कहा मैं निर्धन नहीं तुम धन मेरे
मैंने माना
परन्तु मैं अर्जुन नहीं
मेरे भगवन
मेरे प्रभु
दया करो
लड़ना मुझे रुचिकर नहीं
पत्थरो की इस भीड़ में
लड़ लड़ मैं थका
मुझे थी केवल प्रेम की आस
मुझे थी केवल अपनों के साथ की प्यास
और वो निकला अन्धविश्वास
स्वार्थ रहा कि अपनों के साथ रहूं नरम
अब
मुझे तुम्हारे सिवा कुछ नहीं चाहिए
प्रभु
मुझे तुम चाहिए
तुम मिल जाओ
मुझे अपनी भक्ति के रस में बस डूबने दो
मुझे बार बार अर्जुन न कहो
मैं निर्बल हूँ प्रभु
आपकी शरण में हूँ
मेरी निर्बलता ही मेरा बल है
मुझे मीरा ही बनने दो
मुझे अर्जुन न कहो
प्रभु
मुझे अपनी भक्ति में रम जाने दो
हे कृष्णा
इस भव सागर में डूबने से बचाओ
पर स्वयं में डूबने दो
तुम्हारा सच्चे प्रेम में डूबने दो
तुम्हारे अपनेपन में डूबने दो
मेरे पास प्रेम नहीं
मेरे पास अपने नहीं
बस तुम मेरे
♥ हे कृष्णा ♥
केवल तुम मेरे


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